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बिहार की सत्ता में जाति का गणित, कौन रहा हावी और आगे किसकी बारी?
- Reporter 21
- 10 Apr, 2026
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा निर्णायक रहे हैं। आजादी के बाद सवर्ण, फिर 1990 के बाद पिछड़ा वर्ग का दबदबा रहा। अब अगला मुख्यमंत्री किस वर्ग से होगा, इस पर सियासी अटकलें तेज हैं।
पटना/आलम की खबर:बिहार की राजनीति को समझना हो तो सिर्फ पार्टियों और नेताओं को देखना काफी नहीं होता, यहां सत्ता की असली कहानी जातीय समीकरणों के भीतर छिपी रहती है। यही वजह है कि हर चुनाव के साथ यह सवाल फिर से उठ खड़ा होता है कि इस बार किस जाति का पलड़ा भारी रहेगा और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन विराजमान होगा। राज्य में सैकड़ों जातियां होने के बावजूद सत्ता के शीर्ष पद तक पहुंचने वाली जातियां हमेशा सीमित ही रही हैं। आजादी के बाद से अब तक का इतिहास देखें तो साफ दिखता है कि समय के साथ सत्ता का सामाजिक आधार बदलता रहा है—कभी सवर्णों का वर्चस्व रहा, तो कभी पिछड़े वर्ग ने राजनीति की धुरी अपने हाथ में ले ली।
स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशकों में बिहार की सत्ता पर सवर्ण नेताओं का दबदबा साफ नजर आता है। उस दौर में प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक पकड़ के आधार पर सवर्ण नेताओं ने लंबा शासन किया। इनमें Sri Krishna Singh का नाम सबसे प्रमुख रूप से लिया जाता है, जिन्होंने करीब डेढ़ दशक से अधिक समय तक मुख्यमंत्री पद संभालते हुए एक स्थिर नेतृत्व दिया। उनके बाद भी कई सवर्ण नेता मुख्यमंत्री बने और कुल मिलाकर यह वर्ग लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में बना रहा। यह वह दौर था जब राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व का दायरा सीमित था और सत्ता एक निश्चित वर्ग के इर्द-गिर्द घूमती थी।
1990 के बाद बदला सत्ता का सामाजिक चेहरा
समय के साथ बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव 1990 के दशक में देखने को मिला, जब पिछड़े वर्ग की राजनीति ने जोर पकड़ा और सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल गया। इस दौर में Lalu Prasad Yadav का उदय केवल एक नेता का उभार नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय की राजनीति का विस्तार भी था। उनके नेतृत्व में पिछड़े वर्ग को राजनीतिक केंद्र में जगह मिली और लंबे समय तक यह वर्ग सत्ता में प्रभावी बना रहा।
इसके बाद Rabri Devi ने भी मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली और यह संकेत दिया कि सामाजिक समीकरणों के साथ-साथ पारिवारिक और राजनीतिक निरंतरता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बाद के वर्षों में Nitish Kumar ने विकास और संतुलन की राजनीति के साथ खुद को स्थापित किया और वे सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले नेताओं में शामिल हो गए। उनके कार्यकाल ने यह भी दिखाया कि पिछड़ा वर्ग की राजनीति केवल भावनात्मक मुद्दों तक सीमित नहीं रही, बल्कि शासन और विकास के एजेंडे के साथ आगे बढ़ी।
अतिपिछड़ा और सीमित प्रतिनिधित्व
बिहार की राजनीति में अतिपिछड़ा वर्ग की भूमिका भी अहम रही है, लेकिन मुख्यमंत्री पद तक उनकी पहुंच बेहद सीमित रही। इस वर्ग से Karpoori Thakur एक बड़े नेता के रूप में उभरे, जिन्होंने सामाजिक न्याय की नींव मजबूत की। हालांकि उनके बाद इस वर्ग से मुख्यमंत्री बनने का सिलसिला आगे नहीं बढ़ पाया, जो यह दिखाता है कि राजनीति में संख्या के बावजूद प्रतिनिधित्व हमेशा समान नहीं होता।
दलित और अल्पसंख्यक नेतृत्व की सीमित मौजूदगी
अगर अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक वर्ग की बात करें तो बिहार में इन वर्गों से भी मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा। Bhola Paswan Shastri, Ram Sundar Das और Jitan Ram Manjhi जैसे नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के चलते वे लंबे समय तक सत्ता में नहीं टिक सके।
अल्पसंख्यक वर्ग से Abdul Ghafoor का नाम उल्लेखनीय है, जो इस समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हुए मुख्यमंत्री बने। हालांकि इसके बाद से इस वर्ग की भागीदारी शीर्ष पद पर बहुत सीमित ही रही है। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि बिहार की राजनीति में सामाजिक विविधता होने के बावजूद सत्ता का संतुलन कुछ खास वर्गों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है।
अब आगे किसकी बारी?
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले समय में मुख्यमंत्री पद पर कौन सा सामाजिक वर्ग अपनी पकड़ बनाएगा। लंबे समय से सत्ता में बने Nitish Kumar के बाद नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं तेज हैं। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या इस बार कोई नया सामाजिक समीकरण सामने आएगा या फिर परंपरागत जातीय संतुलन ही कायम रहेगा।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि क्या इस बार अतिपिछड़ा वर्ग से कोई नया चेहरा उभरेगा, या फिर किसी ऐसी जाति को मौका मिलेगा जो अब तक सत्ता के शीर्ष पद से दूर रही है। वहीं यह संभावना भी जताई जा रही है कि बिहार एक बार फिर किसी महिला नेतृत्व को देख सकता है, जिससे राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
निष्कर्ष
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि सत्ता की संरचना का आधार रहे हैं। समय के साथ सत्ता का केंद्र बदलता रहा है, लेकिन यह बदलाव पूरी तरह संतुलित नहीं कहा जा सकता। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बिहार की राजनीति एक नए सामाजिक संतुलन की ओर बढ़ती है या फिर पुराने समीकरण ही नए रूप में सामने आते हैं। फिलहाल नजरें आने वाले राजनीतिक फैसलों पर टिकी हैं, जो तय करेंगे कि बिहार की सत्ता की बागडोर अगली बार किसके हाथ में जाएगी।
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